​कभी-कभी जो मेरा मन बहका

कभी-कभी जो मेरा मन बहका,

काल के चक्रव्यूह को मैंने कब समझा,

तब जीवन संघर्षमयि हुँकार भरी ।



फिर किंतु-परंतु क्यों ?

जब मन मेरा, डगर मेरा,

जब तुरिया* है, वर्षों का साथी,




कभी अर्जुन बन, कभी अभिमन्यु बन ।

इतिहास दे रहा गवाही, मैंने कभी ना आश गवाई,




कभी अर्जुन बन जग जीता, कभी एकलब्य बन मुस्कुराया । 

|कॉपी राईट: राजीव रंजन 😉

*तुरिया= consciousness|




जीवन में बहुत सारी चैलेंजेज आते रहती हैं, जवाब है, उनपे नियंत्रण पाना।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s