दहेज़- इस कुचक्र का अंत कब ?

दहेज़ सिर्फ सोशल मीडिया या आश पास में चिंतन-बहस करने से खत्म नही होगा | ये समाज में एक शैतान की तरह है | इसके लिए पुरे समाज को एकजुट हो  साथ आना होगा और इसे कई सामाजिक समेल्लनों में इस मुद्दे को  उठा के खत्म करना होगा | समाज में लोगों के बीच काफी जागरूकता आ गयी है, किन्तु दहेज़ ख़त्म नहीं हो रहा, दहेज़ खत्म करने के लिए कई समस्यावों का समाधान निकलना होगा, जैसे:

  1. सांस्कृतिक विरासत के तौर आई मानसिक अवधारणा: दहेज़ का लोगों के बीच सांस्कृतिक विरासत के तौर पे आने की वजह से, हर माता-पिता के मन में एक मानसिक अवधारणा सी हो गयी है, की उन्हें बेटी के शादी में दहेज़ देना है और बेटे के शादी में लेना है | और भारत में लगभग सभी घरों में बेटे और बेटियां होती हैं | ये एकतरफा नहीं, एक चक्र सा है | माता-पिता अपनी बेटी के शादी में काफी पैसे खर्च करते हैं, और बेटे के शादी में वो भी दहेज़ लेने के उम्मीद में होते हैं | ये उलट-पलट वाली बात ने समस्या को जटिल बना रखा है |
  2. लड़कियों में आत्मनिर्भरता की बेहद कमी, और शादी के बाद हाउस-वाइफ बन के रहना: इसका दहेज़ प्रथा से गहरा सम्बन्ध है, इस बात में बड़ी गहराई है | शिक्षित एवं आत्मनिर्भर लड़कियों पे दहेज़ का प्रभाव आम लड़कियों जैसा नहीं होता |
  3. भारतीय लड़कियों में स्वतंत्रता की कमी: भारतीय लड़कियों को अपने जीवन जीने की आजादी बेहद कम है | वो अपने जीवन के निर्णय एक हद तक ही ले पाती हैं | शादी से पहले उनपे उनके माता-पिता-भाई का दबाव होता है, और शादी के बाद, पति-सास-ससुर | क्यूंकि शादी का निर्णय परिवारों पे होता है, वो अपने हिसाब से शादियां ले-दे कर तय करते हैं | विकशित देशों में अगर कोई ये बात करे, की लड़के-लड़की एक दुसरे को फोटो देख पसंद करके शादी कर लें, तो ये अनर्थ होगा | ऐसे तो लोग घर का सामान लेने से घबराते हैं, जीवनसाथी फोटो के आधार पे, या सिर्फ एक बार देख के, असंभव |
  4. रीति-रिवाज और शादी के लम्बे समारोह पे खर्च: शादी का लम्बा समारोह, एवं सैकड़ों अतिथियों का स्वागत, उनके रहने-ठहरने, एवं खाने में होने वाला बड़ा खर्च | फिर भी अतिथियों और दोस्तों को शादी में मजा नहीं आता | वे अकसर मेहमान नवाजी से नाखुश रह जाते हैं |
  5. सोने के आभूषणों एवं महेंगे कपड़ों का चलन: सोना दहेज़ को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान देता है | मैं अपने कई दोस्तों को जनता हूँ, जो बिना दहेज़ के शादी करना चाहते थे और किया भी | किन्तु सोने के आभूषणों ने उनका बुरा हाल किया | अब तो हीरे की अंगूठी आ गयी है | अगर जेवर अच्छे न मिले, तो जीवन भर के ताने |
  6. अगर होटल में शादी हुवी तो इनका अलग जलवा | परिवहन के लिए भी कई गाड़ियाँ चाहिए |
  7. सभी रिश्तेदारों को कपड़े एवं गिफ्ट देने का चलन |
  8. शादी को सामाजिक प्रतिष्टा से जोड़ना और उस आधार से खर्च: हमारे समाज में शादी के खर्च, जाती एवं सामाजिक प्रतिष्टा के हिसाब से बड़ा एवं छोटा होता है | लोग भव्य शादी करके उसे उपनी प्रतिष्टा के साथ जड़ते हैं | इस अवधारणा को तोड़, सामान्य रूप से शादी कार्यक्रम को बढ़ावा देना होगा | इत्यादि….

उपर्युक्त बिंदु सांकेंतिक हैं, वैसे तो ये बातें सबको पता है, की दहेज़ होने के क्या कारण हैं, और ये क्यूँ चलता आ रहा | हम सभी बातों को जान कर भी अनजान बने रहते हैं | और समाधान ढूंढने की वजह सोशल मीडिया या आस-पास हर जगह बेवजह बहस का मुद्दा बनाये रखते हैं | देश को दहेज़ मुक्त करने के लिए, उपरोक्त सभी पहलूवों को सुलझाना होगा | एक बार में न सही, किन्तु एक-एक करके |

मैं आप सब से एक प्रश्न करना चाहता हूँ, दहेज़ पे बात करने वाले कितने ऐसे लोग हैं, जिनके घरों में दहेज़ प्रथा नहीं है ? दहेज़ पे बात करने वालों, दुनिया की फ़िक्र करना अच्छी बात है, किन्तु सबसे पहले अपने घर को दहेज़ मुक्त करो | और सोशल मीडिया पे अपडेट करो, की मेरा घर दहेज़ मुक्त है, लोग उसी से प्रेरित हो जायेंगे |

 

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s