​कभी-कभी जो मेरा मन बहका

कभी-कभी जो मेरा मन बहका, काल के चक्रव्यूह को मैंने कब समझा, तब जीवन संघर्षमयि हुँकार भरी । फिर किंतु-परंतु क्यों ? जब मन मेरा, डगर मेरा, जब तुरिया* है, वर्षों का साथी, कभी अर्जुन बन, कभी अभिमन्यु बन । … Continue reading ​कभी-कभी जो मेरा मन बहका